मैंने तय कर लिया था पहले अपनी जान दूंगा - मुज़फ्फरनगर दंगे में एक पत्रकार की आपबीतीSociety 

“मैंने तय कर लिया था पहले अपनी जान दूंगा” – मुज़फ्फरनगर दंगे में एक पत्रकार की आपबीती

मुज़फ्फरनगर दंगो पर आधारित आस मोहम्मद कैफ द्वारे लिखित सीरीज़ की दूसरी रिपोर्ट..

मुज़फ्फरनगर: मै सहारनपुर में था, 27 अगस्त फेसबुक पर एक परिचित ने लिखा कि कवाल में साम्प्रदयिक दंगो में 3 मरे, मुझे झटका सा लगा क्योंकि एक महीने से मुज़फ्फरनगर और शामली का देहात सुलग रहा था, आम आदमी भले ही न समझ पाए हो मगर हम जैसे पत्रकारो को आने वाले कल का अहसास होने लगा था|

जानने पर पता चला की एक मुस्लिम युवक को मार कर भाग रहे दो जाट युवको को मुस्लिमो की भीड़ ने पीट पीट कर मार दिया तो मैं और ज्यादा डर गया| शामली और मुज़फ्फरनगर के देहातों में तनाव काफी बढ़ गया था और मुझे आभास हो गया था के दंगा रुक नहीं पायेगा| मेरी पत्नी और बेटा ससुराल में थे, घर आना जरुरी था और खतरे को भांप कर मेरा दिल काबू में नही था|



28 अगस्त की सुबह फज़र की नमाज पढ़कर हम मीरापुर की और चले, कवाल रास्ते में पड़ता था, मेरे घर से 15 किमी पहले| सहारनपुर से मुज़फ्फरनगर तक सबकुछ ठीक था, मुज़फ्फरनगर बस स्टैंड पर बस बदलनी थी, बस स्टैंड के ठीक सामने एसएसपी का आवास है| लगभग 8 बजे होंगे, 9 बजे गौरव् और सचिन की अंत्योष्टि थी, आवास पर एसएसपी की गाड़ी खड़ी थी, पुलिस की हलचल बता रही थी की अभी भी वो यहीं है|

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मंजिल सैनी ऐसी पुलिस कप्तान है जो हर मुश्किल हालात में खुद मौके पर रह कर डटकर सामना करती है और उन का उस समय अपने आवास पैर होने से मुझे शॉक लगा| गौरव और सचिन के अंतिम संस्कार के बाद माहौल खराब होने की संभावना है और वो घर पर है, मौके पर क्यों नही? जवाब की तलाश में ज़हन को दौड़ाते हुए बस में बैठे एक सज्जन जो अख़बार पढ़ रहे थे, एक शीर्षक पर नज़र पड़ी “एक के बदले में दो क़त्ल” जैसे अख़बार प्रेरित कर रहा हो कि अब आप दो के बदले में चार क़त्ल कर दो, एक खबर का शीर्षक था “सीने पर चढ़कर काटी थी सांसो की डोर”!


बस बिजनोर की तरफ जा रही थी, मेरी बीवी और बेटा मेरे साथ थे, मीरापुर रास्ते में पड़ता है| दो लोगो की आपसी बातचीत से पता चला कि डीएम और एसएसपी को रात ही हटा दिया गया और दोनों ने रात ही में चार्ज छोड़ दिया है| शायद इसलिए एसएसपी आवास पर थी| 25 से 30 मुसाफिरों से भरी बस में रौनक नही लग रही थी, मेरी बीवी के अलावा सिर्फ दो और महिलाऐ बुर्का पहने हुई थी, मुश्किल से 3 या 4 मुसलमान होंगे मगर अब तक सब ठीक था| कवाल की घटना को लेकर सवारियों में आपस में चर्चा होने लगी, अक्सर मैं भी चर्चा में शामिल हुआ करता था मगर आज नही खामोश रहा| एक ने कहा मुसलमानो ने दो ‘जाकत ‘(किशोर) मार दिए, पत्थरो से! लोग लगातार उत्तेजना पैदा कर रहे थे और सरकार और मुसलमानो पर बरस रहे थे| कह रहे थे कि हमारी कोई नही सुन रहा सब मुसलमानो की बात कर रहे हैं, हमारे अफसर भी रातों रात हटा दिए गए और आज़म खान को भी गाली दे रहे थे, मगर उन्होंने हमें कुछ नही कहा|

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सामान्य दिनों के मुक़ाबले उस दिन सड़क पर ट्रैफिक कम था, शायद कुछ सुबह सवेरे की वजह से भी| रास्ते में पुलिस कहीं दिखाई नही दी, यह सवाल भी मेरे मन में था कि इतने तनाव के बाद भी पुलिस कहाँ है?
मुज़फ्फरनगर में अजीब सन्नाटा था, मै आज आना ही नही चाहता था और अब पछता रहा था| मैंने अपने फ़ोन से आईजी जोन मेरठ को अपनी लोकेशन भेज कर मैसेज कर दिया था कि हमें मदद की जरुरत है| वैसे हमे किसी ने कुछ कहा नही था मगर बस में जो बातचीत हो रही थी वो डर पैदा कर रही थी| हम नगला मदोड पहुंच गए थे कवाल से 2 किमी पहले, जहाँ बाद में दोनों पंचायतें हुई थी|


28 अगस्त को अंत्योष्टि वाले दिन यहाँ भारी भीड़ थी, सड़क के दोनों तरफ ट्रैक्टर और बुग्गी खड़ी थी| सैकड़ो लोगो के हाथ में लाठी डंडे और फरसे थे, मैंने अपने बच्चे की तरफ देखा और नजर हटा ली| मैंने तय कर लिया था कि पहले अपनी जान दूंगा पर अपने बच्चे पर कोई आंच न आने दूंगा| बस की खिड़की से मुझे चंद्रपाल फौजी दिखाई दिए, वो भारतीय किसान यूनियन के पश्चिम के अध्यक्ष है, पत्रकारिता की पृष्ठभूमि के चलते मेरे जानकार थे| मैंने उन्हें आवाज़ दी, आवाज़ मेरे गले में ही रह गयी, निकली ही नही| गोली चलने की आवाज़ आने लगी, अचानक भगदड़ हुई, चंद्रपाल फौजी ने चिल्लाकर मेरी बस के कडंक्टर से कहा “रामकुमार नहर की पटरी को ले जा गाँव में गोली चल रही है”| यह भी इत्तेफ़ाक़ था कि कडंक्टर स्थानीय था और ड्राइवर मुसलमान| यह वही नहर थी जिसमे ट्रैक्टर ट्रॉली फेंक दिए गए थे, एक बार उधर मुड़ने के बाद ड्राईवर ने गाड़ी बिजली की गति से दौड़ा दी| मैं लगातार अपने लोगो को मैसेज कर लोकेशन की जानकारी देता रहा|

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बस पहले जोली पहुंची, वहां मदरसों को देखकर मुझे लगा यहीं उतर जाना उचित होगा, ये पूरा मुस्लिम बेल्ट है, खेड़ी, बेहड़ा, तेवड़ा, जटवाड़ा वगैरह| हमारे लोग यहाँ रिसीव करने पहुँच गए, वहां से हम जानसठ आ गए|
जानसठ में बहुत तनाव था, दोनों पक्षो के लोग हथियार लेकर छतों पर खड़े थे| यहाँ पता चला कि गौरव और सचिन के अंतिम संस्कार के बाद जाटो की भीड़ ने कवाल पर हमला कर दिया था जिसमे एक मुसलमान की मौत हो गई| इन्हें खदेड़ने के लिए सीओ अरुण सिरोही और इंस्पेक्टर अरुण त्यागी को गोली चलानी पड़ी दोपहर के बाद शाहनवाज़ को दफ़न किया गया और तब जाकर डरते डराते बमुश्किल मैं अपने परिवार के साथ मीरापुर पहुंच गया|


आज ही के दिन, चार साल पुराना यह डर आज भी रोंगटे खड़े कर देता है| मैंने लगभग पुलिस के हर अफसर को मैसेज किया था मगर पुलिस की मदद नही पहुंची थी मगर मेरे अपने लोग जरूर आ गए थे| कभी कभी मैं सोचता हूँ चंद्रपाल फौजी मेरी आवाज सुन लेते तो, भीड़ बस पर हमला कर देती तो, उस दिन मैंने अहद किया था अब ऐसी गलती दोबारा नही होगी| इसी दिन नए एसएसपी सुभाष चंद्र दुबे को हेलीकॉप्टर से लेकर एडीजीपी अरुण कुमार सीधे कवाल लेकर पहुंचे|