कवाल से ठीक चार साल बाद... मुज़फ्फरनगर दंगो की पड़तालSociety 

कवाल से ठीक चार साल बाद… मुज़फ्फरनगर दंगो की पड़ताल

हाल के इतिहास में मुज़फ्फरनगर दंगा उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा हिंसक माना जाता है| अगस्त-सितंबर 2013 में हुए इस दंगे में 42 मुस्लिम और 20 हिंदुओं सहित कम से कम 62 मौतें हुईं और 93 घायल और 50,000 से अधिक विस्थापित हुए। ऐसा दंगा, जिसने उस इलाके की सामाजिक स्थिति बदल दी| दो समुदाय के बीच ऐसी लाइन खीच दी जिसने दोनों को अलग अलग पाले में खड़ा कर दिया| मुज़फ्फरनगर दंगे के चार साल होने पर आस मोहम्मद कैफ ने दोबारा फिर उसी जगह का दौरा किया जहाँ से ये खूनी खेल शुरू हुआ था| आज चार साल बीतने के बाद भी वहां पी ए सी तैनात है| लोगो के दिल में खौफ है| पेश है इस सीरीज की पहली रिपोर्ट..

कवाल, मुज़फ्फरनगर: 27 अगस्त 2013 को कवाल में तीन कत्ल हुए ,एक मुसलमान और दो जाट लड़को के| यह मुज़फ्फरनगर की एक सामान्य आपराधिक घटना थी मगर यह घटना आधुनिक भारत के इतिहास के सबसे कलंकित करने वाले साम्प्रदयिक दंगे की जमीन बन गयी, राजनीत के खेल में कवाल मोहरा बना और मुज़फ्फरनगर खून में नहा गया|

15 दिन तक हुई साम्प्रदयिक हिंसा में 100 से ज्यादा लोग मारे गए (सरकार के हिसाब से 62, मगर बाद में लापता को भी मर्तक मान लिया गया) दर्जनो बलात्कार हुए , सैकड़ो घर जला दिए गए, कई धार्मिक स्थल मिस्मार कर दिए गए, लाखों लोग बेघर हो गए और कवाल के माथे एक कलंक छोड़ गए|


जानसठ से मुज़फ्फरनगर मार्ग पर कवाल एक गाँव है ,जहाँ 8 हजार की आबादी है| मुस्लिम बहुल इस गाँव में 3 हजार से ज्यादा कुरैशी बिरादरी के लोग हैं| 27 अगस्त को जिस शहनवाज़ का क़त्ल करके गौरव और सचिन भाग रहे थे वह शहनवाज़ भी कुरेशी बिरादरी से ही था मगर गौरव और सचिन को मारने वाले सभी कुरैशी नही थे शहनवाज़ के घर से लगभग 100 मीटर आगे चोराहे पर मारे गए गौरव और सचिन को भीड़ ने पीट पीट कर मार डाला, यह बात इसी चौराहे पर मिठाई की दुकान चलाने वाले आफताब बताते हैं| आफ़ताब सामाजिक कार्यकर्ता है और कवाल के दर्द को बखूबी समझते है, आफ़ताब के मुताबिक कवाल में लोगो ने बेटी देना कम कर दिया है और अब रिश्तों में परेशानी होती है| वे कहते हैं की कवाल में दंगा नही हुआ आपसी झगडे में तीनों जाने गई, जिसका आज भी दुःख है| राजनीतिकरण के चलते अमन में आग लग गयी, आफ़ताब आगे बताते हैं के दंगाो की आग में हवन कर कई नेता बन गऐ, रासुका में जेल में बंद रहे विक्रम सैनी विद्यायक बन गए मगर गाँव में मुस्लिमो के साथ भी उनका अच्छा बर्ताव है, बाहर वो कैसे भी हो!

जिन विक्रम सैनी की बात आफ़ताब कर रहे है वो और मुफ़्ती मुकर्रम दोनों को दंगो का दोषी मानते हुए रासुका में निरुद्ध किया गया था, गाँव में हमने कई लोगो से यह जानने की कोशिश की विक्रम सैनी की गलती क्या थी और उनपर रासुका क्यों लगी? मगर अब विद्यायक बन चुके विक्रम सैनी के खिलाफ कोई नही बोलता| मोहम्मद आजम बताते है कि इस झगडे में विक्रम सैनी और मुफ़्ती मुकर्रम की कोई गलती नही थी मगर यह दोनों कट्टरपंथी विचारधारा के थे और पुलिस ने इन दोनों को ही जिम्मेदार माना| मुफ़्ती मुकर्रम जेल में रहकर बर्बाद हो गए और दंगो ने विक्रम सैनी को आबाद कर दिया पहले वो जिला पंचायत सदस्य बने और अब विद्यायक है| खतौली विधानसभा से भाजपा ने उन्हें प्रत्याशी बनाया था|


कवाल के पास के गाँव मलिकपुरा में गौरव और सचिन की बरसी की तैयारी चल रही है, इस बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी जनपद जिलाधिकारी के माध्यम से बुलावा भेजा गया था मगर वो नही आये| गौरव और सचिन मलिकपुरा के रहने वाले थे, मलिकपुरा में इन दोनों को शहीद मानकर इनकी प्रतिमा भी लगी है| मलिकपुरा कवाल से सटा हुआ एक छोटा गाँव है जिसका रास्ता कवाल के बीच को होकर गुजरता है, मलिकपुरा के बच्चे इसी रास्ते से स्कूल जाते थे| जिस दिन शहनवाज़ और गौरव में झगड़ा हुआ तो उस दिन मीडिया ने कहा यह झगड़ा छेड़छाड़ को लेकर हुआ और इसका बड़ा पैमाने पर प्रचार भी हुआ|

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मगर इस बात को खुद मर्तक गौरव के पिता और इस मामले के पक्षकार रविंद्र ने झुठला है, जानसठ कोतवाली पर दर्ज एफआईआर संख्या 403/13 में वादी रविंद्र ने लिखकर दिया कि मेरे पुत्र गौरव और शहनवाज़ में साईकिल टकराने को लेकर विवाद हुआ जिसके बाद उनकी हत्या कर दी गयी|

जबकि दंगे के कहानी लिखने वालो ने कहा कि हिन्दू लड़की से छेड़छाड़ के विरोध पर मुसलमानो ने दो सगे भाइयो का क़त्ल कर दिया, एक अख़बार ने दंगा भड़काने के लिये घटना की काल्पनिक कहानी ऐसे लिख दी जैसे लाइव टेलीकास्ट किया गया हो, शीर्षक था “सीने पर चढ़कर काटी थी साँसो की ड़ोर”| दंगे फ़ैलाने की साज़िश के तहत पाकिस्तान की वीडियो को कवाल की बताकर प्रचार दिया गया|


मर्तक शहनवाज़ के ताया अब्बू नसीम अहमद बताते है कि शाहनवाज़ की मलिकपुरे के गौरव से साईकिल टकराने से कहासुनी हो गयी, गौरव ने कहा कि “अपनी मां से पैदा है तो यहीं मिलना” वो अपने ममेरे भाई सचिन के साथ आया और शहनवाज़ को चाकू से मार दिया, बाद में वो भाग गए| शोर मचाने पर भीड़ ने इन दोनों को मार दिया, बस यही सच है|

नसीम अहमद इस घटना के बाद हुए दंगो, जो कई कवाल के माथे पैर कलंक बन चुके हैं पर दुःख व्यक्त करते हुए बताते है की चार साल से उनके बेटे जेल में है पर जमानत पर सुनवाई भी नही हुई| उन में से एक मुज्जमिल विकलांग है| शहनवाज़ की हत्या में बाकि लोगो को पुलिस ने विवेचना में निकाल दिया था, गौरव और सचिन की हत्या के आरोप में बंद उनके बच्चो की जमानत पर अब तक सुनवाई नही हुई|

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पहले शहनवाज़ का कत्ल हुआ, उसके 10 मिनट बाद गौरव और सचिन का, जाहिर है कि शहनवाज़ की एफआईआर पहले लिखी जानी चाहिए, मगर गौरव और सचिन की एफआईआर पहले, तीन बजे लिखी गयी और शहनवाज़ की एफआईआर रात में साढ़े नौ बजे|

सवाल यह भी था जिस सरकार पर मुस्लिमो की हिमायती होने का इल्जाम लग रहा था वो मक़तूल के पिता की तहरीर तक नही ले रही थी, इस सवाल को किसी ने नही उठाया पूछने पर अलग अलग जवाब आते है जैसे कवाल के चाँद मोहम्मद कहते है कि इस घटना के बाद डीएम और एसएसपी ने गांव में आकर जिस प्रकार से एक समुदाय के लोगो को निशाना बनाया और बेगुनाहों को गिरफ्तार कर लिया तो किसी की भी थाने जाने की हिम्मत नहीं हुई ,सब डर रहे थे कि पुलिस जेल भेज देगी|


उस समय जानसठ सीओ रहे जगतराम जोशी के अनुसार हम इंतेज़ार कर रहे थे मगर वो आये ही नही ,पहले जो पक्ष आया उसकी रिपोर्ट लिख दी गयी, मगर जानसठ के नोशाद के मुताबिक घटना के बाद ही कोतवाली पर भारी भीड़ जमा हो गयी थी जहाँ पहले से ही एक सौ से ज्यादा गाड़िया थी| रात में 9 बजे डीएम सुरन्द्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी को हटा दिया गया और उसके बाद शहनवाज़ पक्ष की रिपोर्ट दर्ज की गयी, पास के गाँव के पूर्व प्रधान सज़्ज़ाद कहते है दरअसल डीएम और एसएसपी जज्बात में बह गए थे वो शहनवाज़ पक्ष की रिपोर्ट नही लिख रहे थे, जब वो हटे तब शहनवाज़ का मुकदमा दर्ज हुआ ,यह बात किसी मीडिया और नेता की जानकारी तक नही पहुंची|

कवाल में हिरासत में लिए गए 7 लोगो को छोड़ना भी आज तक सवाल है, कहा जाता है कि इन्हें पूर्व सरकार में मंत्री रहे आज़म खान के कहने पर छोड़ा गया मगर ऐसा नही है, उस समय के सीओ जगतराम जोशी बताते है कि इनमें से एक भी नामजद अभियुक्त नही था, इन्हें छोड़ना ही था, निर्दोष थे तो छोड़ दिया|

अब सवाल यह है कि कवाल पर इस घटनाक्रम का क्या असर पड़ा है? साम्प्रदयिक सौहार्द कायम करने में सहायता प्रदान करने वाले यहाँ के प्रधान महिन्द्र सैनी कहते है, लोगो के बर्ताव में कोई फर्क नही है वो अच्छा है मगर जब बाहर जाते है तो कवाल के लोग हिकारत से देखे जाते है जबकि यहाँ सिर्फ घटना हुई कोई दंगा नही हुआ और यह हमारी बदकिस्मती है कि गाँव में चार साल से पीएसी तैनात है ।